सहज हो जाना !
सहज हो जाना शायद वह अंतिम पडाव है जहा वैदिक और पौराणिक दर्शन की कूटबद्ध कथाये हमे ले जाने का प्रयास करती प्रतीत होती हैं ! अब तक मैने जिन शास्त्रो को समझा हैं या गुरू मंडल से जो आशिर्वाद मिला हैं उसके आधार पर यह समझ पाना आसान है कि अच्छा - बुरा, सत्य - असत्य, सही - गलत आदि द्वैत भाव ही निषकर्ष प्राप्त करने मे सबसे बड़े अवरोधक हैं !
हां, पर यह सुनिश्चित है कि अच्चाई, सत्य और सही ही अपनाने योग्य है ! कारण यह है कि इसी मे नियम, क्रम, संयम, सद आचरण, ममता, दया आदि मानवीय गुण विद्यमान है ! यही वह तत्व है जो साम्य को मानता है और उसमे कोई हस्तक्षेप नही करता ! इसी प्रकार यदि बुरा, असत्य और गलत के क्रम मे देखें तो अनेक उदाहरण मिल जायेगे जब इस तत्व ने अपनी सीमाओ का आतिक्रमण किया है ! अनियमित, अव्यवस्थित, दुराचरण आदि अमानवीय तत्व ही इसके मूल मे है ! यह कि जब जब बुराई ने अच्चाई के अधिकारो को छीना है और साम्य को नष्ट किया है, ईश्वर ने स्वयं इसका प्रतिकार कर पुन: साम्य स्थापित किया है !
अच्छा है कि हम उस सिधांत के साथ होकर प्रकाश कि ओर चले ! आखिरी सर्वथा मूढ कीट भी प्रकाश कि ओर जाता है ! फिर विवेक युक्त मनुष्य क्यू अंधकार कि ओर जाये !
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