ईश्वर सदबुद्धि दें।

जानवर का जीवन आसान होता है और मनुष्य जानवर की तरह नहीं जी सकता। पर बुद्धि और विवेक से जीने के लिए जिस संकल्प शक्ति की आवश्यकता होती है उसे तो लोगों ने नशे, उदारवादी बनने, और जानवर की तरह जीकर उसे ही इंसान का जीवन मानने और मनवाने में नष्ट कर डाला है।
अगली पीढ़ी को हम अपने से भी अधिक नशा, पशुवत् उन्मुक्त जीवन, भोग-विलासिता और मानसिक रूप से कमजोर बनाने वाले सभी उपक्रम परोसने के लिए सभी माध्यमों से धन संचय कर रहें हैं।
यह कमजोर लोगों का और व्यक्तित्वहीन समाज है जो अपने पतन की ओर अग्रसर है। ईश्वर सदबुद्धि दें।

 

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